क्यों मनाया जाता है ओणम जानिए राजा महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार की पौराणिक कथा
केरल की समृद्ध संस्कृति और प्राकृतिक सुंदरता के बीच मनाया जाने वाला ओणम (Onam) एक ऐसा त्योहार है, जो न केवल खुशहाली, समृद्धि और एकता का संदेश देता है, बल्कि हमारे गौरवशाली इतिहास और पौराणिक जड़ों से भी जोड़ता है। यह दक्षिण भारत, विशेषकर केरल का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण वार्षिक उत्सव है। हर साल मलयालम कैलेंडर के पहले महीने ‘चिंगम’ में मनाया जाने वाला यह पर्व दस दिनों तक चलता है।
ओणम का मुख्य उत्सव सिर्फ रंग-बिरंगे फूलों, स्वादिष्ट व्यंजनों या नावों की रेस तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध एक महान दानवीर राजा और भगवान विष्णु के अद्भुत अवतार की गाथा से है। इस साल, ओणम 2026 की शुरुआत 16 अगस्त 2026 से हो रही है, और इसका सबसे महत्वपूर्ण दिन यानी थिरुवोणम (Thiruvonam) 26 अगस्त 2026, दिन बुधवार को मनाया जाएगा। आइए जानते हैं कि यह पावन त्योहार आखिर क्यों मनाया जाता है और इसके पीछे की पौराणिक कथा क्या है।
कौन थे राजा महाबली और उनके राज्य की क्या विशेषता थी?
ओणम का त्योहार पूरी तरह से असुर राज महाबली (जिन्हें मावेली भी कहा जाता है) की याद और उनके सम्मान में मनाया जाता है। महाबली दैत्यराज प्रहलाद के पौत्र थे। वे असुर कुल में जन्म लेने के बाद भी एक परम ज्ञानी, धर्मपरायण और अत्यंत परोपकारी शासक थे।
राजा महाबली के शासनकाल को केरल के इतिहास का स्वर्ण काल माना जाता है, जिसकी प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार थीं:
समानता और न्याय: महाबली के राज्य में कोई भी अमीर या गरीब नहीं था। सभी नागरिकों को समान अधिकार प्राप्त थे और चोरी, बेईमानी या छल-कपट का नामोनिशान नहीं था।
प्रजा की खुशहाली: राज्य में कभी अकाल या भुखमरी नहीं पड़ी। चारों तरफ हरियाली थी और प्रजा अपने राजा को भगवान की तरह पूजती थी।
अथाह दानवीरता: राजा महाबली के द्वार से कभी कोई याचक खाली हाथ नहीं लौटता था। वे अपनी प्रजा और ब्राह्मणों को मुंह मांगा दान देने के लिए प्रसिद्ध थे।
देवताओं का भय और भगवान विष्णु का वामन अवतार
राजा महाबली की लोकप्रियता और उनकी बढ़ती शक्ति से स्वर्ग के राजा इंद्र और अन्य देवता भयभीत होने लगे। महाबली ने अपने पराक्रम से तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। देवताओं को डर था कि यदि महाबली ने अपना सौवां अश्वमेध यज्ञ पूरा कर लिया, तो वे हमेशा के लिए स्वर्ग के स्वामी बन जाएंगे।
अपनी सत्ता और स्वर्ग को वापस पाने के लिए सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में गए। तब भगवान विष्णु ने देवताओं की रक्षा और राजा महाबली के अहंकार की परीक्षा लेने के लिए वामन अवतार धारण किया।
छोटा स्वरूप: भगवान विष्णु ने एक अत्यंत बौने और तेजस्वी ब्राह्मण बालक का रूप लिया।
यज्ञ शाला में प्रवेश: वामन देव उस समय राजा महाबली की यज्ञ शाला में पहुंचे जब वे नर्मदा नदी के तट पर यज्ञ कर रहे थे और दान बांट रहे थे।
तीन पग भूमि की मांग: जब महाबली ने वामन देव से उनकी इच्छा पूछी, तो वामन देव ने केवल अपने पैरों से नापकर तीन पग (कदम) भूमि की मांग की।
तीन पग भूमि और महाबली का आत्मसमर्पण
असुरों के गुरु शुक्राचार्य वामन देव के वास्तविक स्वरूप को पहचान गए थे। उन्होंने महाबली को चेतावनी दी कि यह कोई साधारण ब्राह्मण नहीं बल्कि साक्षात भगवान विष्णु हैं जो छल करने आए हैं। लेकिन दानवीर महाबली अपने वचन से पीछे नहीं हटे और उन्होंने वामन देव को तीन पग भूमि दान करने का संकल्प ले लिया।
वचन मिलते ही भगवान विष्णु के वामन अवतार ने अपना विराट रूप धारण किया और दो ही कदमों में पूरी सृष्टि को नाप दिया:
पहला पग: वामन देव ने अपने पहले कदम में पूरी पृथ्वी और भूलोक को नाप लिया।
दूसरा पग: उन्होंने अपने दूसरे कदम में स्वर्ग लोक और अंतरिक्ष को नाप लिया। अब तीसरा कदम रखने के लिए कोई स्थान नहीं बचा था।
महाबली का मस्तक: जब वामन देव ने पूछा कि मैं अपना तीसरा कदम कहाँ रखूँ, तो राजा महाबली ने पूरी विनम्रता के साथ अपना सिर आगे कर दिया और कहा, “हे प्रभु, अपना तीसरा पग मेरे मस्तक पर रख दीजिए।”
पाताल लोक का राज्य और राजा महाबली को मिला वरदान
भगवान विष्णु महाबली की सच्ची भक्ति, न्यायप्रियता और अटूट दानवीरता देखकर अत्यंत प्रसन्न हुए। जैसे ही वामन देव ने अपना तीसरा पैर महाबली के सिर पर रखा, वे पाताल लोक चले गए। लेकिन भगवान ने उन्हें खाली हाथ नहीं भेजा।
भगवान विष्णु ने महाबली को पाताल लोक (सुतल लोक) का राजा बना दिया और उन्हें कई अद्भुत वरदान दिए:
द्वारपाल बने विष्णु: महाबली की भक्ति से प्रसन्न होकर स्वयं भगवान विष्णु ने उनके पाताल लोक के महल का द्वारपाल बनना स्वीकार किया।
वर्ष में एक बार लौटने का वरदान: महाबली अपनी प्रजा से बेहद प्यार करते थे। इसलिए भगवान विष्णु ने उन्हें वरदान दिया कि वे साल में एक बार अपनी प्रजा और प्रिय राज्य केरल का हालचाल जानने के लिए पृथ्वी पर आ सकेंगे।
ओणम के रूप में स्वागत: राजा महाबली के पाताल लोक से अपनी धरती पर वापस लौटने के इसी पावन दिन को केरलवासी हर साल ओणम के उत्सव के रूप में बेहद धूमधाम से मनाते हैं।
ओणम के 10 दिनों की भव्य परंपराएं
केरल के लोग अपने प्रिय राजा महाबली को यह दिखाना चाहते हैं कि उनके जाने के बाद भी उनकी प्रजा सुखी, समृद्ध और बेहद खुश है। इसलिए ओणम के त्योहार को किसी बड़े महोत्सव की तरह सजाया जाता है।
इस पर्व के दौरान कई सुंदर सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की जाती हैं:
पुक्कलम (Pookalam): घरों के आंगनों को रंग-बिरंगे फूलों की सुंदर रंगोलियों से सजाया जाता है, जिसे पुक्कलम कहते हैं। इसे राजा महाबली के स्वागत के लिए बिछाया जाता है।
ओणम सद्या (Onam Sadya): थिरुवोणम के दिन केले के पत्ते पर परोसा जाने वाला पारंपरिक महाभोज ‘सद्या’ तैयार किया जाता है, जिसमें लगभग 26 अलग-अलग तरह के शाकाहारी व्यंजन और पायसम शामिल होते हैं।
वल्लमकाली (Vallam Kali): पंबा नदी में प्रसिद्ध ‘स्नेक बोट रेस’ (नौका दौड़) का आयोजन किया जाता है, जो एकता और आपसी तालमेल का सबसे सुंदर उदाहरण है।
पुलीकली (Pulikali): इस दिन लोग अपने शरीर पर चीते या बाघ जैसी पेंटिंग बनाकर पारंपरिक ढोल की थाप पर नृत्य करते हैं।
निष्कर्ष
ओणम केवल एक क्षेत्रीय त्योहार नहीं है, बल्कि यह परोपकार, सत्य और बिना किसी अहंकार के अपना सब कुछ समर्पित कर देने की सीख देने वाला एक महान पर्व है। यह हमें याद दिलाता है कि भले ही राजा महाबली एक असुर राजा थे, लेकिन उनके नेक कर्मों और प्रजा के प्रति असीम प्रेम ने उन्हें अमर बना दिया।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
क्या ओणम केवल केरल में ही मनाया जाता है?
मुख्य रूप से ओणम केरल का राजकीय और सबसे बड़ा त्योहार है, लेकिन अपनी खूबसूरत संस्कृति के कारण इसे अब पूरे भारत और दुनिया भर में रहने वाले मलयाली समुदायों द्वारा बेहद उत्साह के साथ मनाया जाता है।
ओणम के त्योहार में ‘पुक्कलम’ का क्या महत्व है?
‘पुक्कलम’ फूलों से बनी एक सुंदर कलाकृति होती है। मान्यता है कि ओणम के दस दिनों के दौरान राजा महाबली अदृश्य रूप में हर घर में आते हैं, और उनके स्वागत के लिए ही द्वारों पर फूलों की यह रंगोली सजाई जाती है।
थिरुवोणम का क्या अर्थ है?
थिरुवोणम ओणम के दस दिवसीय उत्सव का सबसे मुख्य और अंतिम दिन होता है। यह श्रवण नक्षत्र के दिन आता है और इसी विशेष दिन राजा महाबली का पृथ्वी पर आगमन माना जाता है।

